Забур 104 CARS - स्तोत्र 104 HCV

Священное Писание

Забур 104:1-45

Песнь 104

(1 Лет. 16:8-22)

1Славьте Вечного, призывайте Его имя,

возвещайте народам о Его делах.

2Воспойте Ему, пойте Ему хвалу,

рассказывайте о всех Его чудесах.

3Хвалитесь Его святым именем;

пусть веселятся сердца ищущих Вечного.

4Ищите Вечного и силу Его,

всегда ищите Его лица.

5Помните чудеса, которые Он сотворил,

знамения Его и суды, что Он произнёс,

6о потомки Ибрахима, раба Его,

о сыны Якуба, избранные Его!

7Он – Вечный, наш Бог,

суды Его по всей земле.

8Он помнит вечно Своё соглашение –

слово, данное Им для тысяч поколений, –

9соглашение, заключённое Им с Ибрахимом,

помнит клятву, данную Исхаку.

10Он поставил его Якубу законом,

Исраилу – вечным соглашением,

11сказав: «Я отдам тебе Ханаанскую землю

в удел твоего наследия»104:9-11 См. Нач. 15:18-21; 26:3-4; 28:13-14..

12Когда они были малочисленны и незначительны

и были чужеземцами на этой земле,

13то скитались от народа к народу

и из царства в царство.

14Он никому не давал их притеснять

и укорял за них даже царей,

15говоря: «Не трогайте помазанников Моих

и пророкам Моим не делайте зла»104:12-15 См. Нач. 12:10-20; 20..

16Он послал голод на землю,

уничтожил все запасы пищи.

17Он послал перед ними человека:

в рабство был продан Юсуф.

18Стеснили оковами его ноги,

надели на шею железное ярмо,

19пока не исполнилось его предсказание,

пока слово Вечного не доказало его правоту.

20Царь приказал, и развязали его,

владыка народов освободил его.

21Он сделал его господином над своим домом

и правителем над всем своим владением,

22чтобы он наставлял104:22 Или: «удерживал в известных пределах». его приближённых

и старейшин его учил мудрости104:16-22 См. Нач. 37; 39–41..

23Тогда пришёл Исраил в Египет,

и жил Якуб в земле Хама104:23 То есть в Египте. Египтяне были потомками Хама (см. Нач. 10:6-10). как чужеземец.

24И умножил Всевышний Свой народ

и сделал его сильнее его врагов.

25Возбудил в сердцах их ненависть к Его народу

и хитрость против Его рабов104:23-25 См. Исх. 1:1-14..

26Он послал Мусу, Своего раба,

и Харуна, которого избрал.

27Они показали среди них Его чудеса

и Его знамения – в земле Хама.

28Он послал тьму, и стало темно,

и они не воспротивились Его слову.

29Он обратил воды Египта в кровь

и погубил в них рыбу.

30Земля их закишела множеством жаб,

которые вошли даже в покои царей.

31Он произнёс слово, и налетели тучи мух,

и комары заполонили все их земли.

32Он послал на них град вместо дождя

и пылающий огонь – на их землю.

33Побил их виноград и инжир,

поломал деревья в их земле.

34Сказал, и пришла саранча,

целые тучи без числа,

35и съели всю траву в их земле

и плоды на их полях.

36Затем Он поразил всех первенцев в их земле –

первые плоды их мужской силы104:26-36 См. Исх. 3; 4; 7–12..

37Он вывел Исраил с серебром и золотом,

и не было ни одного среди родов, кто бы споткнулся.

38Египет обрадовался их уходу,

потому что устрашился их104:37-38 См. Исх. 12:35-36..

39Всевышний простёр облако, чтобы укрыть их,

и огонь, чтобы светить ночью104:39 См. Исх. 13:21-22..

40Народ попросил, и Он послал перепелов,

и насытил людей хлебом с небес104:40 См. Исх. 16..

41Рассёк скалу, и полились воды,

рекой потекли в пустыне104:41 См. Исх. 17:1-7..

42Ведь Он вспомнил Своё святое обещание

Ибрахиму, рабу Своему104:42 См. Нач. 12:1-3; 15; 17..

43Он вывел Свой народ в радости,

избранных Своих в веселии.

44Дал им земли народов,

и они унаследовали то, над чем трудились другие,

45Он сделал это, чтобы они соблюдали Его установления

и хранили Его законы.

Славьте Вечного!

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 104:1-35

स्तोत्र 104

1मेरे प्राण, याहवेह का स्तवन करो.

याहवेह, मेरे परमेश्वर, अत्यंत महान हैं आप;

वैभव और तेज से विभूषित हैं आप.

2आपने ज्योति को वस्त्र समान धारण किया हुआ है;

आपने वस्त्र समान आकाश को विस्तीर्ण किया है.

3आपने आकाश के जल के ऊपर ऊपरी कक्ष की धरनें स्थापित की हैं.

मेघ आपके रथ हैं

तथा आप पवन के पंखों पर यात्रा करते हैं.

4हवा को आपने अपना संदेशवाहक बनाया है,

अग्निशिखाएं आपकी परिचारिकाएं हैं.

5आपने ही पृथ्वी को इसकी नींव पर स्थापित किया है;

इसे कभी भी सरकाया नहीं जा सकता.

6आपने गहन जल के आवरण से इसे परिधान-सम्मान सुशोभित किया;

जल स्तर पर्वतों से ऊंचा उठ गया था.

7किंतु जब आपने फटकार लगाई जल हट गया,

आपके गर्जन समान आदेश से जल-राशियां भाग खड़ी हुई;

8जब पर्वतों की ऊंचाई बढ़ी,

तो घाटियां गहरी होती गई,

ठीक आपके नियोजन के अनुरूप निर्धारित स्थान पर.

9आपके द्वारा उनके लिए निर्धारित सीमा ऐसी थी;

जिसका अतिक्रमण उनके लिए संभव न था, कि वे पृथ्वी को पुन: जलमग्न कर सकें.

10आप ही के सामर्थ्य से घाटियों में झरने फूट पड़ते हैं;

और पर्वतों के मध्य से जलधाराएं बहने लगती हैं.

11इन्हीं से मैदान के हर एक पशु को पेय जल प्राप्त होता है;

तथा वन्य गधे भी प्यास बुझा लेते है.

12इनके तट पर आकाश के पक्षियों का बसेरा होता है;

शाखाओं के मध्य से उनकी आवाज निकलती है.

13वही अपने आवास के ऊपरी कक्ष से पर्वतों की सिंचाई करते हैं;

आप ही के द्वारा उपजाए फलों से पृथ्वी तृप्त है.

14वह पशुओं के लिए घास उत्पन्न करते हैं,

तथा मनुष्य के श्रम के लिए वनस्पति,

कि वह पृथ्वी से आहार प्राप्त कर सके:

15मनुष्य के हृदय मगन करने के निमित्त द्राक्षारस,

मुखमंडल को चमकाईए करने के निमित्त तेल,

तथा मनुष्य के जीवन को संभालने के निमित्त आहार-उत्पन्न होता है.

16याहवेह द्वारा लगाए वृक्षों के लिए अर्थात लबानोन में

लगाए देवदार के वृक्षों के लिए जल बड़ी मात्रा में होता है.

17पक्षियों ने इन वृक्षों में अपने घोंसले बनाए हैं;

सारस ने अपना घोंसला चीड़ के वृक्ष में बनाया है.

18ऊंचे पर्वतों में वन्य बकरियों का निवास है;

चट्टानों में चट्टानी बिज्जुओं ने आश्रय लिया है.

19आपने नियत समय के लिए चंद्रमा बनाया है,

सूर्य को अपने अस्त होने का स्थान ज्ञात है.

20आपने अंधकार का प्रबंध किया, कि रात्रि हो,

जिस समय वन्य पशु चलने फिरने को निकल पड़ते हैं.

21अपने शिकार के लिए पुष्ट सिंह गरजनेवाले हैं,

वे परमेश्वर से अपने भोजन खोजते हैं.

22सूर्योदय के साथ ही वे चुपचाप छिप जाते हैं;

और अपनी-अपनी मांदों में जाकर सो जाते हैं.

23इस समय मनुष्य अपने-अपने कार्यों के लिए निकल पड़ते हैं,

वे संध्या तक अपने कार्यों में परिश्रम करते रहते हैं.

24याहवेह! असंख्य हैं आपके द्वारा निष्पन्न कार्य,

आपने अपनी अद्भुत भलाई में इन सबकी खंभों की रचना की है;

समस्त पृथ्वी आपके द्वारा रची प्राणियों से परिपूर्ण हो गई है.

25एक ओर समुद्र है, विस्तृत और गहरे,

उसमें भी असंख्य प्राणी चलते फिरते हैं—

समस्त जीवित प्राणी हैं, सूक्ष्म भी और विशालकाय भी.

26इसमें जलयानों का आगमन होता रहता है,

साथ ही इसमें विशालकाय जंतु हैं, लिव्याथान104:26 बड़ा मगरमच्छ हो सकता है, जिसे आपने समुद्र में खेलने के लिए बनाया है.

27इन सभी की दृष्टि आपकी ओर इसी आशा में लगी रहती है,

कि इन्हें आपकी ओर से उपयुक्त अवसर पर आहार प्राप्त होगा.

28जब आप उन्हें आहार प्रदान करते हैं,

वे इसे एकत्र करते हैं;

जब आप अपनी मुट्ठी खोलते हैं,

उन्हें उत्तम वस्तुएं प्राप्त हो जाती हैं.

29जब आप उनसे अपना मुख छिपा लेते हैं,

वे घबरा जाते हैं;

जब आप उनका श्वास छीन लेते हैं,

उनके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं और वे उसी धूलि में लौट जाते हैं.

30जब आप अपना पवित्रात्मा प्रेषित करते हैं,

उनका उद्भव होता है,

उस समय आप पृथ्वी के स्वरूप को नया बना देते हैं.

31याहवेह का तेज सदा-सर्वदा स्थिर रहे;

याहवेह की कृतियां उन्हें प्रफुल्लित करती रहें.

32जब वह पृथ्वी की ओर दृष्टिपात करते हैं, वह थरथरा उठती है,

वह पर्वतों का स्पर्श मात्र करते हैं और उनसे धुआं उठने लगता है.

33मैं आजीवन याहवेह का गुणगान करता रहूंगा;

जब तक मेरा अस्तित्व है, मैं अपने परमेश्वर का स्तवन गान करूंगा.

34मेरा मनन-चिन्तन उनको प्रसन्न करनेवाला हो,

क्योंकि याहवेह मेरे परम आनंद का उगम हैं.

35पृथ्वी से पापी समाप्त हो जाएं,

दुष्ट फिर देखे न जाएं.

मेरे प्राण, याहवेह का स्तवन करो.

याहवेह का स्तवन हो.