Забур 102 CARS - स्तोत्र 102 HCV

Священное Писание

Забур 102:1-22

Песнь 102

Песнь Давуда.

1Прославь, душа моя, Вечного;

всё нутро моё, славь Его святое имя!

2Прославь, душа моя, Вечного

и не забудь добрые дела Его –

3Того, Кто прощает все твои беззакония

и исцеляет все твои болезни;

4Кто избавляет от могилы твою жизнь

и венчает тебя милостью и щедротами;

5Кто наполняет твою жизнь благами,

чтобы ты опять стал сильным, как молодой орёл.

6Вечный творит праведность

и правосудие для всех угнетённых.

7Мусе показал Он Свои пути

и дела Свои – народу Исраила.

8Милостив и милосерден Вечный102:8 Милостив и милосерден Вечный – это выражение основано на словах из Таурата (см. Исх. 34:6) и является родственным арабскому выражению: «бисмиллях-ир-рахман-ир-рахим», что переводится как: «Во имя Аллаха милостивого и милосердного». В доисламской Аравии христиане государства Набатея использовали похожее выражение, переняв его из иудейской традиции.,

долготерпелив и богат любовью.

9Не вечно Он сердится

и не бесконечно гневается.

10Он поступил с нами не так, как мы того заслуживали,

и не по нашим преступлениям Он воздал нам.

11Как небо высоко над землёю,

так велика Его милость к боящимся Его.

12Как далёк восток от запада,

так удалил Он от нас наши грехи.

13Как отец жалеет своих детей,

так Вечный жалеет боящихся Его,

14ведь Он знает, из чего мы состоим,

помнит, что мы – прах.

15Дни человека – как трава;

он цветёт, как полевой цветок.

16Пройдёт над ним ветер, и нет его,

и даже следа от него не останется.

17Но от века и до века

милость Вечного к боящимся Его,

18и Его праведность – на детях их детей,

на хранящих Его соглашение

и помнящих Его наставления, чтобы исполнять их.

19Вечный поставил Свой престол на небесах;

Он царствует над всем.

20Прославьте Вечного, ангелы Его,

сильные, исполняющие Его повеления

и повинующиеся Его слову.

21Прославьте Вечного, все Его небесные воинства,

Его служители, исполняющие Его волю.

22Прославьте Вечного, все Его творения,

во всех местах Его владычества.

Прославь, душа моя, Вечного!

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 102:1-28

स्तोत्र 102

संकट में पुकारा आक्रांत पुरुष की अभ्यर्थना. वह अत्यंत उदास है और याहवेह के सामने अपनी हृदय-पीड़ा का वर्णन कर रहा है

1याहवेह, मेरी प्रार्थना सुनिए;

सहायता के लिए मेरी पुकार आप तक पहुंचे.

2मेरी पीड़ा के समय मुझसे अपना मुखमंडल छिपा न लीजिए.

जब मैं पुकारूं.

अपने कान मेरी ओर कीजिए;

मुझे शीघ्र उत्तर दीजिए.

3धुएं के समान मेरा समय विलीन होता जा रहा है;

मेरी हड्डियां दहकते अंगारों जैसी सुलग रही हैं.

4घास के समान मेरा हृदय झुलस कर मुरझा गया है;

मुझे स्मरण ही नहीं रहता कि मुझे भोजन करना है.

5मेरी सतत कराहटों ने मुझे मात्र हड्डियों

एवं त्वचा का ढांचा बना छोड़ा है.

6मैं वन के उल्लू समान होकर रह गया हूं,

उस उल्लू के समान, जो खंडहरों में निवास करता है.

7मैं सो नहीं पाता.

मैं छत के एकाकी पक्षी-सा हो गया हूं.

8दिन भर मैं शत्रुओं के ताने सुनता रहता हूं;

जो मेरी निंदा करते हैं, वे मेरा नाम शाप के रूप में जाहिर करते हैं.

9राख ही अब मेरा आहार हो गई है

और मेरे आंसू मेरे पेय के साथ मिश्रित होते रहते हैं.

10यह सब आपके क्रोध,

उग्र कोप का परिणाम है क्योंकि आपने मुझे ऊंचा उठाया और आपने ही मुझे अलग फेंक दिया है.

11मेरे दिन अब ढलती छाया-समान हो गए हैं;

मैं घास के समान मुरझा रहा हूं.

12किंतु, याहवेह, आप सदा-सर्वदा सिंहासन पर विराजमान हैं;

आपका नाम पीढ़ी से पीढ़ी स्थायी रहता है.

13आप उठेंगे और ज़ियोन पर मनोहरता करेंगे,

क्योंकि यही सुअवसर है कि आप उस पर अपनी कृपादृष्टि प्रकाशित करें.

वह ठहराया हुआ अवसर आ गया है.

14इस नगर का पत्थर-पत्थर आपके सेवकों को प्रिय है;

यहां तक कि यहां की धूल तक उन्हें द्रवित कर देती है

15समस्त राष्ट्रों पर आपके नाम का आतंक छा जाएगा,

पृथ्वी के समस्त राजा आपकी महिमा के सामने नतमस्तक हो जाएंगे.

16क्योंकि याहवेह ने ज़ियोन का पुनर्निर्माण किया है;

वह अपने तेज में प्रकट हुए हैं.

17वह लाचार की प्रार्थना का प्रत्युत्तर देता है;

उन्होंने उनकी गिड़गिड़ाहट का तिरस्कार नहीं किया.

18भावी पीढ़ी के हित में यह लिखा जाए,

कि वे, जो अब तक अस्तित्व में ही नहीं आए हैं, याहवेह का स्तवन कर सकें:

19“याहवेह ने अपने महान मंदिर से नीचे की ओर दृष्टि की,

उन्होंने स्वर्ग से पृथ्वी पर दृष्टि की,

20कि वह बंदियों का कराहना सुनें और उन्हें मुक्त कर दें,

जिन्हें मृत्यु दंड दिया गया है.”

21कि मनुष्य ज़ियोन में याहवेह की महिमा की घोषणा कर सकें

तथा येरूशलेम में उनका स्तवन,

22जब लोग तथा राज्य

याहवेह की वंदना के लिए एकत्र होंगे.

23मेरी जीवन यात्रा पूर्ण भी न हुई थी, कि उन्होंने मेरा बल शून्य कर दिया;

उन्होंने मेरी आयु घटा दी.

24तब मैंने आग्रह किया:

“मेरे परमेश्वर, मेरे जीवन के दिनों के पूर्ण होने के पूर्व ही मुझे उठा न लीजिए;

आप तो पीढ़ी से पीढ़ी स्थिर ही रहते हैं.

25प्रभु, आपने प्रारंभ में ही पृथ्वी की नींव रखी,

तथा आकाशमंडल आपके ही हाथों की कारीगरी है.

26वे तो नष्ट हो जाएंगे किंतु आप अस्तित्व में ही रहेंगे;

वे सभी वस्त्र समान पुराने हो जाएंगे.

आप उन्हें वस्त्रों के ही समान परिवर्तित कर देंगे

उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा.

27आप न बदलनेवाले हैं,

आपकी आयु का कोई अंत नहीं.

28आपके सेवकों की सन्तति आपकी उपस्थिति में निवास करेंगी;

उनके वंशज आपके सम्मुख स्थिर रहेंगे.”