Bibelen på hverdagsdansk

Efeserbrevet 4:1-32

Paulus opfordrer til enhed gennem ydmyghed og kærlighed

1Jeg, som nu sidder fængslet her, fordi jeg tjener Herren, bønfalder jer om at leve det kald værdigt, som I har modtaget. 2Vær ydmyge og imødekommende. Vær tålmodige og bær over med hinanden i kærlighed. 3Gør alt for at fastholde den enhed, som Helligånden skaber, og den fred, som binder os sammen. 4Vi er jo dele af det samme legeme og har fået den samme Ånd, ligesom vi har den samme stærke forventning om en herlig fremtid. 5Der er kun én Herre, én tro, én dåb 6og én Gud, som er Far for os alle. Han står over os alle, virker gennem os alle og bor i os alle.

Kristi gaver til menighedens vækst og udvikling

7Kristus har delt ud af sine åndelige gaver til os, og vi har hver især fået nåde til at tjene ham i overensstemmelse med hans plan. 8Det hedder jo: „Han steg op til det høje, frigav fanger og gav menneskene gaver.”4,8 Fra Sl. 68,19a, muligvis i Paulus’ egen oversættelse. Teksten er uklar. 9Når der står, at han steg op, må det betyde, at han først var steget ned til jordens nederste regioner.4,9 Betydningen er omstridt, men der tænkes nok på dødsriget, jf. Sl. 63,10 og 1.Pet. 3,19. 10Og han, som steg ned, er den samme som steg op, højt over himmelrummet, for at bringe alt til fuldendelse.

11Kristus gav os apostle, profeter, evangelister, hyrder og lærere. 12Deres opgave er at træne de kristne til at udføre hver deres tjeneste, så Kristi legeme kan styrkes og udvikles, 13indtil vi alle når frem til enhed i troen på og forståelsen af Guds Søn, til en sådan grad af åndelig modenhed, at vi fuldt ud kan repræsentere Kristus.

14Målet er, at vi ikke længere skal være ustabile som en båd, der kastes hid og did af vinden, eller være som godtroende børn. Lad os ikke blive vildledt af menneskers snedige påhit og falske lærdomme. 15Nej, i trofasthed overfor sandheden og i kærlighed til hinanden skal vi vokse op til at ligne Kristus på enhver måde. Det er jo ham, der er hovedet for legemet, 16og under hans ledelse sammenføjes det og vokser i kærlighed, idet hver enkelt del udfører sin specielle opgave og derved hjælper til at knytte det hele sammen til en enhed.

Lev det nye liv

17På Herrens vegne siger jeg: I må ikke længere leve som de gudløse, der ikke har noget mål i livet. 18På grund af deres formørkede tankegang, deres uvidenhed om Gud og deres afvisende holdning er de fremmedgjorte over for det liv, Gud gerne vil give dem. 19De er uden forståelse for Guds vilje, og i deres egoisme har de kastet sig ud i en umoralsk livsstil.

20Sådan må I ikke leve. I er blevet undervist om Kristus, 21-22og I har lært, at sandheden findes hos Jesus. Derfor skal I aflægge den gamle livsstil, som I havde før i tiden, da I blev bedraget af jeres begær og var på vej mod fortabelsen. 23I stedet skal I fornyes i tanker og sind. 24I skal iklæde jer det nye liv, som Gud har givet jer, så I kan ligne ham og leve med en ren samvittighed i lydighed mod sandheden.

25Læg al løgn til side og tal sandhed til hinanden.4,25 Zak. 8,16. Vi er jo lemmer på det samme legeme. 26Bliver I oprørte over noget, da synd ikke.4,26 Sl. 4,5a. Lad ikke solen gå ned over jeres vrede, 27og lad ikke Djævelen få fodfæste i jeres liv. 28De, som plejer at stjæle, skal holde op med det og i stedet bruge hænderne til noget godt, så de har noget at give af til dem, der har brug for hjælp. 29Undgå sårende ord. Sig hellere noget, som kan styrke og opmuntre. Lad jeres ord være til velsignelse for dem, I taler til. 30Gør ikke Helligånden bedrøvet. Gud har jo beseglet jer med sin Ånd og dermed bekræftet, at I hører ham til og vil få del i den endelige befrielse.

31Afhold jer fra enhver form for bitterhed, hidsighed, vredesudbrud, skænderier og hånlige ord, ja alt, hvad der er ondt. 32Vær venlige og barmhjertige over for hinanden. Tilgiv hinanden, ligesom Gud tilgav jer på grund af det, Kristus har gjort.

New Chhattisgarhi Translation (नवां नियम छत्तीसगढ़ी)

इफिसुस 4:1-32

कलीसिया म एकता

1तब परभू खातिर एक कैदी के रूप म, मेंह तुमन ले बिनती करथंव कि ओ बुलावा के लइक जिनगी जीयव, जेकर बर तुमन बलाय गे हवव। 2पूरा-पूरी दीन अऊ नम्र बनव अऊ धीर धरके मया म एक-दूसर के सह लेवव। 3सांति के बंधन म बंधाके पबितर आतमा के एकता ला बनाय रखे के पूरा कोसिस करव। 4एक देहें अऊ एक पबितर आतमा हवय, जइसने कि एके आसा हवय, जेकर बर परमेसर ह तुमन ला बलाय हवय। 5एक परभू, एक बिसवास अऊ एक बतिसमा अय। 6अऊ जम्मो झन के एके परमेसर अऊ ददा अय, जऊन ह जम्मो के ऊपर अऊ जम्मो के बीच म अऊ जम्मो म हवय।

7मसीह के ईछा के मुताबिक, हमन ले हर एक झन ला अनुग्रह दिये गे हवय। 8एकरसेति परमेसर के बचन ह कहिथे: “जब ओह ऊंचहा जगह म चघिस, ओह अपन संग बंधुआमन ला ले गीस, अऊ मनखेमन ला बरदान दीस।”4:8 भजन-संहिता 68:18 9(ओह ऊपर चघिस – एकर मतलब होथे कि ओह पहिली, धरती के खाल्‍हे भागमन म उतरिस। 10जऊन ह खाल्‍हे उतरिस, एह ओहीच अय, जऊन ह अकासमन ले घलो बहुंत ऊपर चघिस, ताकि जम्मो संसार ला अपन उपस्थिति ले भर देवय।) 11एह ओ अय, जऊन ह कुछू झन ला प्रेरित, कुछू झन ला अगमजानी, कुछू झन ला सुघर संदेस के परचारक अऊ कुछू झन ला पास्टर अऊ गुरूजी होय के बरदान दीस, 12ताकि परमेसर के मनखेमन सेवा के काम खातिर तियार करे जावंय अऊ मसीह के देहें (कलीसिया) ह बढ़त जावय, 13जब तक कि हमन जम्मो झन बिसवास म अऊ परमेसर के बेटा के गियान म एक सहीं नइं होवन, अऊ परिपक्व मनखे बनके ओ पूरा सिद्धता ला नइं पा लेवन, जऊन ह मसीह म पाय जाथे।

14तब हमन लइकामन सहीं नइं रहिबो, जऊन मन मनखेमन के धूर्तता अऊ चतुरई के दुवारा ओमन के धोखा देवइया योजना म पड़ जाथें अऊ ओमन के उपदेस के झोंका ले डावां-डोल होके एती-ओती बहकाय जाथें। 15पर मया म सच ला गोठियाबो अऊ हमन जम्मो बात म, ओम बढ़त जाबो जऊन ह मुड़ी (मुखिया) अय याने कि मसीह। 16अऊ ओकर ले जम्मो देहें जुड़े रहिथे, अऊ ओम हर एक जोड़ के दुवारा जम्मो देहें ह एक संग बने रहिथे; अऊ जब हर भाग ह अपन काम करथे, त एह अपन-आप मया म बढ़त अऊ बनत जाथे।

अंजोर के लइकामन सहीं जिनगी बितई

17एकरसेति, मेंह तुमन ला कहत हंव अऊ परभू म जोर देवत हंव कि जइसने आनजातमन अपन मन के बेकार सोच म चलथें, वइसने तुमन बिलकुल झन चलव। 18ओमन के मन ह अंधियार म हवय। ओमन अपन हिरदय ला कठोर कर ले हवंय, जेकर कारन ओमन म अगियानता हवय अऊ अगियानता के कारन ओमन परमेसर के जिनगी ले अलग हो गे हवंय। 19ओमन ला कोनो सरम नइं ए, ओमन अपन-आप ला दुराचार के काम बर दे देय हवंय, ताकि हर किसम के असुध काम म हमेसा देहें के वासना म बने रहंय।

20पर तुमन मसीह के अइसने सिकछा नइं पाय हवव। 21तुमन सही रूप म, ओकर सुने हवव अऊ ओ सच्‍चई के सिकछा पाय हवव, जऊन ह यीसू म हवय। 22एकरसेति अपन पुराना चाल-चलन ला छोंड़ देवव, जऊन ह तुम्‍हर पहिली के जिनगी ले संबंध रखथे अऊ अपन धोखा देवइया लालसा के दुवारा बिगड़त जाथे; 23अऊ अपन मन के आतमा म नवां बन जावव; 24अऊ नवां चाल-चलन ला धर लेवव, जऊन ह सही के धरमीपन अऊ पबितरता म, परमेसर के सरूप म सिरजे गे हवय।

25एकरसेति, लबारी गोठियाय ला छोंड़ देवव अऊ तुमन ले हर एक झन अपन पड़ोसी ले सच गोठियावय, काबरकि हमन जम्मो झन एके देहें के सदस्य अन। 26गुस्सा त करव, फेर पाप झन करव; सूरज के बुड़त के पहिली अपन गुस्सा ला थूक देवव। 27अऊ सैतान ला कोनो मऊका झन देवव। 28जऊन ह चोरी करथे, ओह अब चोरी झन करय, पर ईमानदारी के काम म अपन हांथ ले मिहनत करय; ताकि जऊन मन ला जरूरत हवय, ओमन ला देय बर ओकर करा कुछू रहय।

29तुम्‍हर मुहूं ले कोनो खराप बात झन निकरय, पर सिरिप ओहीच बात निकरय, जऊन ह जरूरत के मुताबिक आने मन के बढ़ती म मददगार होथे, ताकि जऊन मन सुनंय, ओमन ला एकर ले फायदा होवय। 30अऊ परमेसर के पबितर आतमा ला उदास झन करव, जेकर दुवारा तुम्‍हर ऊपर ओ दिन बर मुहर लगे हवय, जब पाप ले मुक्ति होही। 31जम्मो किसम के करू बात, रोस, गुस्सा, कलह, निन्दा अऊ जम्मो किसम के बईरता ला छोंड़ देवव। 32एक-दूसर के ऊपर दया अऊ किरपा करव, अऊ जइसने परमेसर ह मसीह म तुमन ला छेमा करिस, वइसने तुमन घलो एक-दूसर ला छेमा करव।